Zwei junge Affen, verirrt in einer stillen Kleinstadtnacht
Eingabeaufforderung
ज़रूर भाई 🙂
मैं 80–90 के दौर की साद स्टोरी लिख रहा हूँ — भाषा आसान और भावनात्मक रखूँगा।
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शीर्षक: टूटे पेड़ों की याद
80–90 का ज़माना था।
न मोबाइल था, न कैमरे… बस रेडियो की आवाज़, साइकिल की घंटी और कच्ची सड़कों पर उड़ती धूल।
एक छोटे से कस्बे के बाहर कभी घना जंगल हुआ करता था।
उसी जंगल में दो छोटे-छोटे बंदर के बच्चे रहते थे — चीकू और मीतू।
वे भाई-बहन जैसे थे, हर पल साथ।
लेकिन एक दिन सब बदल गया।
जंगल काट दिया गया।
पेड़ गिरते गए… और शोर में उनकी माँ कहीं खो गई।
चीकू और मीतू डर के मारे भागते-भागते इंसानों की बस्ती में आ गए।
अब वे जंगल में नहीं थे,
बल्कि इंसानों की दुनिया में।
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दिन में बच्चे उन्हें देखकर हँसते,
कोई मूँगफली देता,
तो कोई पत्थर भी फेंक देता।
रात को जब पूरा कस्बा सो जाता,
दोनों पुराने रेडियो की दुकान के पीछे बैठकर
एक-दूसरे से चिपक जाते।
चीकू हर रात आसमान की तरफ देखता,
जैसे माँ को ढूँढ रहा हो।
मीतू उसकी पूँछ पकड़कर बस इतना ही समझ पाती थी —
“हम साथ हैं, डरना मत।”
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एक सर्द रात…
रेडियो पर कोई पुराना गाना बज रहा था।
मीतू बहुत कमजोर हो चुकी थी।
दिन भर उसे किसी ने कुछ नहीं दिया था।
चीकू ने पास की दुकान से
एक सूखी रोटी उठाने की कोशिश की,
लेकिन दुकानदार ने डाँटकर भगा दिया।
जब वह लौटा,
मीतू की आँखें बंद थीं।
वो सो रही थी…
या शायद अब कभी नहीं उठेगी।
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सुबह लोग आए,
किसी ने कहा, “अरे एक बंदर मर गया।”
लेकिन किसी ने नहीं देखा
कि पास बैठा चीकू
उसकी ठंडी होती देह को हिला-हिलाकर
अब भी माँ की तरह बुला रहा था।
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कुछ दिन बाद चीकू भी वहाँ नहीं दिखा।
कहते हैं वो कस्बा छोड़कर
किसी टूटे पेड़ की तरफ चला गया था…
शायद वहाँ जहाँ
अब भी उसे अपनी माँ
और मीतू की हँसी सुनाई देती थी।
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अगर चाहो तो मैं
और ज़्यादा छोटा
बच्चों के लिए
या और ज़्यादा इमोशनल वर्ज़न
भी लिख सकता हूँ।
बस बोल देना भाई ❤️