Armer Dorfvater, der hart für seinen starrköpfigen Sohn arbeitet
Eingabeaufforderung
एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक गरीब आदमी रहता था। वह दिन-भर मज़दूरी करता था ताकि अपने बेटे मोहन को पढ़ा-लिखा सके। रामू के पास पैसे कम थे, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे—अपने बेटे के लिए।
मोहन पढ़ाई में ठीक था, लेकिन स्वभाव से बहुत जिद्दी। उसे वो सब चाहिए होता था जो उसके दोस्तों के पास होता—महंगे जूते, नई साइकिल, मोबाइल फोन।
एक दिन मोहन ने ज़िद पकड़ ली,
“पापा, मुझे नई साइकिल चाहिए। सब दोस्तों के पास है!”
रामू ने प्यार से समझाया,
“बेटा, अभी पैसे नहीं हैं। अगली फसल के बाद देखेंगे।”
लेकिन मोहन नहीं माना। उसने खाना छोड़ दिया, बात करना बंद कर दिया। रामू का दिल टूट गया। उसी रात वह ज़्यादा काम की तलाश में निकल पड़ा।
कुछ दिनों बाद मोहन ने देखा कि उसके पापा लंगड़ाकर चल रहे हैं। हाथों में छाले थे, चेहरे पर थकान।
मोहन ने पूछा,
“पापा, आपको क्या हुआ?”
रामू मुस्कराया और बोला,
“कुछ नहीं बेटा, बस मेहनत ज़्यादा हो गई।”
अगले दिन मोहन ने देखा—आँगन में एक पुरानी लेकिन ठीक-ठाक साइकिल खड़ी थी।
रामू ने कहा,
“नई नहीं है बेटा, लेकिन दिल से लाई है।”
मोहन की आँखों में आँसू आ गए।
उसे समझ आ गया कि उसकी ज़िद की कीमत उसके पापा की तकलीफ़ थी।
उस दिन मोहन ने साइकिल नहीं चलाई।
उसने अपने पापा के पैर छुए और बोला,
“मुझे कुछ नहीं चाहिए पापा, बस आप खुश रहो।”
उस दिन एक जिद्दी बच्चा समझदार बन गया
और एक गरीब पापा दुनिया का सबसे अमीर इंसान।