Großzügiger Händler, der friedlich in einer bescheidenen Stadthütte lebt
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सेठ ताराचंद की पूरी कहानी (लोककथा)
बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में सेठ ताराचंद नाम के एक अत्यंत धनी व्यापारी रहते थे। उनके पास धन-दौलत, व्यापार, मान-सम्मान — सब कुछ था। लेकिन सेठ ताराचंद को सबसे ज़्यादा जाना जाता था उनकी ईमानदारी और दानशीलता के लिए।
सेठ का नियम था —
“मेरे पास जो भी है, उसमें गरीब और ज़रूरतमंद का भी हक़ है।”
साधु की परीक्षा
एक दिन नगर में एक साधु आए। वे साधारण नहीं थे, बल्कि सेठ की परीक्षा लेने आए थे। साधु ने सेठ से कहा,
“सेठ जी, मुझे आपकी सारी संपत्ति चाहिए।”
नगर के लोग हँस पड़े। सबको लगा साधु पागल है।
लेकिन सेठ ताराचंद ने बिना हिचक कहा —
“अगर यही आपकी इच्छा है, तो सब आपकी।”
सेठ ने अपने घर, दुकान, गोदाम — सब कुछ साधु के नाम कर दिया।
सब कुछ खोकर भी शांत
अब सेठ के पास कुछ भी नहीं बचा। वे साधारण कपड़ों में, शांत मन से एक छोटी-सी झोपड़ी में रहने लगे।
लोगों ने पूछा —
“सेठ जी, आपको दुख नहीं होता? सब कुछ चला गया!”
सेठ मुस्कुराकर बोले —
“जो आया था, वो जाएगा। कर्म मेरे साथ है, वही काफी है।”
चमत्कार
कुछ समय बाद वही साधु वापस आए और बोले —
“सेठ ताराचंद, यह सब एक परीक्षा थी। तुम सच्चे दानी हो।”
साधु ने सेठ की सारी संपत्ति लौटा दी, बल्कि पहले से भी कई गुना अधिक धन मिला। कहा जाता है कि उसी दिन से सेठ का व्यापार पूरे राज्य में फैल गया।