Montaña rica en hierro que se alza sobre el bosque denso
Prompt
दंडकारण्य के घने जंगलों के बीच
लोहे से भरी एक विशाल पहाड़ी खड़ी है —
बैलाडीला की पहाड़ी।
सरकारी नक़्शों में इसे
“डिपॉजिट”, “ब्लॉक”, “माइनिंग ज़ोन” कहा गया,
लेकिन आदिवासियों के लिए
यह पहाड़ी देवता है,
पूर्वजों की धरोहर है।
अंग्रेज आए थे।
सर्वे किया,
लाल पत्थरों में छिपे लोहे को पहचाना
और कहा —
“बैलाडीला डिपॉजिट अब खनन के लिए है।”
आदिवासी आगे बढ़ा।
बोला —
“यह धरती हमारी माँ है,
इसके सीने को चीरकर तुम मुनाफ़ा नहीं कमा सकते।”
लड़ाई हुई।
जंगल जले,
गोलियाँ चलीं,
पर आदिवासी झुका नहीं।
उसने बैलाडीला के डिपॉजिट की रक्षा की —
अपने लिए नहीं,
देश और आने वाली पीढ़ियों के लिए।
अंग्रेज चले गए।
लेकिन लूट की सोच नहीं गई।
आज फिर
बैलाडीला की पहाड़ी और उसके डिपॉजिट
निशाने पर हैं।
अब बंदूक की जगह
ठेके, एमओयू और कंपनियाँ हैं।
सरकार कहती है — “विकास”
कंपनियाँ कहती हैं — “निवेश”
लेकिन आदिवासी जानता है —
यह खनिज संपदा को
हमसे छीनकर
पूँजीपतियों को सौंपने की साज़िश है।
आदिवासी आज भी
बैलाडीला की पहाड़ी पर खड़ा है।
वह कहता है —
“हम विकास के विरोधी नहीं,
हम लूट के विरोधी हैं।
बैलाडीला का डिपॉजिट
बेचने की चीज़ नहीं,
संभालने की ज़िम्मेदारी है।”