Jeune homme travaillant dans un champ de village rural à l’aube
Prompt
हल्क अपने गाँव के किनारे बनी एक छोटी-सी झोपड़ी में अपनी माँ के साथ रहता था।
उनके पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन वे एक-दूसरे का सहारा थे।
एक सुबह हल्क खेतों में काम करने गया।
उसकी माँ बाज़ार के लिए निकली, थकी हुई आँखों में उम्मीद लिए।
अचानक सड़क पर एक दुर्घटना हो गई।
गाँव वाले खेतों की ओर दौड़ते हुए चिल्लाने लगे—
“हल्क! तुम्हारी माँ का एक्सीडेंट हो गया है!”
यह सुनते ही हल्क ने सब कुछ छोड़ दिया और पूरी ताकत से दौड़ पड़ा।
उसने अपनी घायल माँ को उठाया और तुरंत अस्पताल ले गया।
डॉक्टर ने कहा,
“उनकी हालत गंभीर है। तुरंत इलाज ज़रूरी है… लेकिन इसमें बहुत पैसा लगेगा।”
हल्क कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने मुट्ठियाँ भींच लीं।
“मैं अपनी माँ को बचाने के लिए कुछ भी करूँगा।”
दिन-रात हल्क पहले से भी ज़्यादा मेहनत करने लगा—
खेतों में, निर्माण स्थलों पर, जहाँ भी काम मिला।
उसकी ताकत, उसका पसीना, उसका दर्द—
सब उम्मीद में बदल गया।
आख़िरकार इलाज पूरा हुआ।
डॉक्टर मुस्कुराए और बोले,
“अब वह बच जाएँगी।”
हल्क ने अपनी माँ का हाथ थामा।
माँ ने धीमे से कहा,
“मेरे बेटे… तुम ही मेरी ताकत हो।”