रात के सन्नाटे में जब चंबल के बीहड़ों से दस-बारह हथियाबंद डकैतों की टोलियाँ गाँव की ओर बढ़ीं, तो पूरे इलाके में सन्नाटा छा गया। सबने डर के मारे अपने दरवाजे बंद कर लिए, लेकिन गाँव की चौपाल पर सिर्फ एक शख्स अकेला बैठा रहा—प्रहलाद चौहान ठाकुर।
हाथ में कुल्हाड़ी और चेहरे पर बेखौफ मुस्कान लिए प्रहलाद ने अकेले ही उन डकैतों का रास्ता रोक लिया। जब सरदार ने गरजकर सरेंडर करने को कहा, तो प्रहलाद ठाकुर बस इतना मुस्कुराकर बोले, "ठाकुरों के गाँव में कदम रखने से पहले अपनी वसीयत लिख के आते, तो बेहतर होता।"
अगले ही पल, जब पहला डकैत आगे बढ़ा, प्रहलाद ने बिजली जैसी फुर्ती से उसे ढहा दिया। अंधियारे में प्रहलाद की कुल्हाड़ी की चमक और उनकी दहाड़ से बीहड़ कांप उठा। उन्होंने अकेले ही अपनी तकनीक और बेजोड़ ताकत के दम पर पूरी टोली के छक्के छुड़ा दिए।
सुबह होते-होते आधे डकैत ज़मीन पर ढेर थे और बाकी अपनी बंदूकें छोड़कर भाग चुके थे। उस दिन के बाद से पूरे इलाके में एक ही बात अमर हो गई—"जहाँ प्रहलाद चौहान ठाकुर खड़े हो जाएँ, वहाँ मौत को भी रास्ता बदलना पड़ता है।"
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