“अधूरी मोहब्बत”
शाम का वक्त था। बारिश की हल्की बूंदें सड़क पर गिर रही थीं, और आरव खिड़की के पास बैठा चाय ठंडी होने का इंतज़ार कर रहा था। उसकी नज़र बार-बार फोन पर जा रही थी, लेकिन स्क्रीन खामोश थी।
आज भी अनन्या का कोई मैसेज नहीं आया।
कभी यही अनन्या हर छोटी-सी बात पर उसे फोन कर लिया करती थी।
“खाना खा लिया?”
“आज बहुत थक गई हूँ।”
“तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”
आरव और अनन्या की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। लाइब्रेरी में एक ही किताब दोनों ने उठाई थी। किताब नहीं मिली, लेकिन मोहब्बत मिल गई।
धीरे-धीरे दोस्ती, फिर आदत, और फिर ऐसा प्यार जो सांसों में बस गया।
वे सपने बनाते थे—
एक छोटा-सा घर, दीवारों पर किताबें, और खिड़की के पास एक पौधा।
अनन्या हँसकर कहती थी,
“हमारी कहानी कभी अधूरी नहीं होगी।”
लेकिन कहानियाँ अक्सर वादों से नहीं चलतीं।
अनन्या के घरवालों को आरव पसंद नहीं था।
“प्यार से पेट नहीं भरता,” उसके पिता ने कहा।
अनन्या ने बहुत कोशिश की। झगड़े किए, रोई, गिड़गिड़ाई।
आरव हर रात खुद को मजबूत दिखाता रहा, लेकिन अकेले में टूटता रहा।
फिर एक दिन अनन्या ने कहा,
“आरव, मैं बहुत थक गई हूँ… शायद अब रुक जाना ही सही है।”
उस दिन आरव ने पहली बार खुद को हारता हुआ महसूस किया।
उसने कहा,
“अगर तुम्हें जाना है, तो मैं रोकूँगा नहीं।
बस इतना बताओ—क्या तुम खुश रहोगी?”
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
वह कुछ नहीं बोली… बस कॉल कट कर दी।
कुछ महीनों बाद आरव ने सुना—
अनन्या की शादी तय हो गई है।
वह शादी में नहीं गया।
लेकिन शादी के दिन उसी जगह चला गया जहाँ वे पहली बार मिले थे।
लाइब्रेरी की वही मेज़, वही कुर्सियाँ।
बस इस बार सामने कोई नहीं था।
फोन में अनन्या की आख़िरी आवाज़ सुनते हुए उसने खुद से कहा,
“कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए नहीं आते,
बस हमें अधूरा छोड़ने आते हैं।”
कई साल बीत गए।
आरव आज भी मुस्कुराता है, काम करता है, लोगों से मिलता है।
लेकिन जब बारिश होती है,
वह खिड़की के पास बैठ जाता है…
और ठंडी चाय के साथ
एक अधूरी मोहब्बत को याद करता है।
क्योंकि
कुछ प्यार पूरे होकर भी हमारे नहीं होते,
और कुछ अधूरे होकर भी जिंदगी भर साथ रहते हैं।