एक छोटे से शहर में एक कुत्ता और एक बंदर रहते थे। दोनों इंसानों जैसे समझदार थे और आपस में बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों का घर भी एक ही था और दिल भी एक जैसा। वे साथ खाते, साथ रहते और साथ ही अपना धंधा करते थे। उनका धंधा था—फल बेचना। रोज़ सुबह दोनों एक ठेले पर ताज़े फल सजाकर बाजार के एक कोने में बैठ जाते थे।
कुत्ता ग्राहकों से प्यार से बात करता और बंदर फलों को तौलकर देता। दोनों की मेहनत और ईमानदारी से उनकी फल की दुकान धीरे-धीरे चलने लगी। लोग दूर-दूर से उनके पास फल खरीदने आने लगे। उनकी कमाई ठीक-ठाक हो जाती थी और वे खुश थे।
लेकिन हर खुशी को किसी की नज़र लग ही जाती है।
एक दिन रात के अंधेरे में कुछ जलनखोर लोग आए। वे कुत्ते और बंदर की तरक्की से बहुत जलते थे। उन्होंने उनकी फल की दुकान को तोड़ दिया, ठेला पलट दिया और सारे फल ज़मीन पर फेंक दिए। सुबह जब कुत्ता और बंदर आए, तो उनका दिल टूट गया। उनकी आँखों में आँसू थे और हाथ खाली।
कुछ दिनों तक दोनों बहुत परेशान रहे। घर का खर्च कैसे चलेगा, यह सोच-सोचकर वे रातों को सो नहीं पाते थे। लेकिन एक दिन बंदर ने कुत्ते से कहा,
“रोने से कुछ नहीं होगा दोस्त, हमें फिर से खड़ा होना होगा।”
कुत्ते ने भी हिम्मत दिखाई। दोनों ने तय किया कि वे फिर से मेहनत करेंगे। पहले उन्होंने छोटे-मोटे काम किए—कभी मजदूरी, कभी सामान ढोना। धीरे-धीरे थोड़े पैसे जमा किए। कई महीनों की मेहनत के बाद उन्होंने फिर से एक नई दुकान बनाई, इस बार पहले से भी बेहतर।
नई दुकान में ताज़े फल, साफ-सुथरी जगह और मुस्कान थी। लोग फिर से आने लगे। उनकी ईमानदारी और संघर्ष की कहानी पूरे बाजार में फैल गई। उनकी कमाई पहले से ज्यादा होने लगी। अब वे सिर्फ फल बेचने वाले नहीं, बल्कि मिसाल बन गए थे।
जब उन लोगों ने देखा जिन्होंने पहले दुकान तोड़ी थी कि कुत्ता और बंदर और भी आगे बढ़ गए हैं, तो वे और ज्यादा जलने लगे। लेकिन अब कुत्ता और बंदर को किसी की परवाह नहीं थी। उन्होंने सीख लिया था कि सच्ची मेहनत को कोई तोड़ नहीं सकता।