अहंकार वह भ्रम है जो मन में यह धारणा बैठा देता है कि मैं सब जानता हूँ और मैं कभी गलत नहीं हो सकता। जब कोई हमारी भूल दिखाता है, तो सत्य को स्वीकार करने के बजाय मन क्रोध की शरण ले लेता है। यही अहंकार की पहचान है। वह विवेक पर परदा डाल देता है और आत्म-स्वीकृति का द्वार बंद कर देता है। जब तक यह परदा नहीं हटता, तब तक सत्य आँखों के सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता।”