“जैसलमेर के किले में रात के ठीक 12 बजे एक बंद कमरा अपने-आप खुल जाता है। अंदर से पायल की आवाज़ और किसी के रोने की धीमी सिसकियाँ सुनाई देती हैं। कहते हैं, जो भी उस कमरे में गया, उसकी लाश अगली सुबह किले की दीवार पर टंगी मिली… और उसके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसे उसने मौत को बहुत करीब से देखा हो। आज भी वो कमरा खाली नहीं है…”