एक छोटे से गाँव के किनारे एक पुराना पीपल का पेड़ था। उसी पेड़ पर रहते थे दो बंदर — चिंकू और मिंकू। दोनों बचपन से साथ थे। माँ-बाप खो चुके थे, लेकिन एक-दूसरे का सहारा बनकर इंसानों के बीच जीना सीख लिया था।
गाँव के लोग उन्हें रोज़ देखते थे।
कोई फल दे देता, कोई हँसकर बुला लेता।
चिंकू थोड़ा शरारती था, और मिंकू बहुत भोला।
अगर कोई बच्चा रोता, मिंकू चुपचाप जाकर पास बैठ जाता — जैसे समझता हो इंसानी दर्द।
समय के साथ गाँव भी उनका घर बन गया।
एक दिन गाँव में एक नया आदमी आया।
दिल में गुस्सा और आँखों में नफ़रत।
उसे बंदर पसंद नहीं थे।
उसने सोचा — “ये जानवर गंदगी फैलाते हैं।”
उस दिन मिंकू नीचे उतरा था।
सिर्फ़ एक केले के छिलके के लिए।
अचानक…
एक ज़ोर की आवाज़।
और मिंकू ज़मीन पर गिर पड़ा।
चिंकू पेड़ से कूद पड़ा।
वो चिल्लाया, रोया, मिंकू को हिलाया…
लेकिन मिंकू की आँखें अब कभी नहीं खुलीं।
पूरा गाँव सन्न रह गया।
जिस इंसान ने मिंकू को मारा, वो चुपचाप खड़ा था —
लेकिन चिंकू की आँखों में जो दर्द था,
वो किसी इंसान से भी ज़्यादा इंसानी था।
उस दिन के बाद चिंकू रोज़ उसी जगह बैठता।
जहाँ मिंकू गिरा था।
ना शरारत, ना कूदना,
बस इंतज़ार।
गाँव के लोग अब समझ गए थे —
जानवर नहीं, दिल मरा हुआ इंसान खतरनाक होता है।
और पीपल के पेड़ के नीचे,
आज भी लोग कहते हैं —
अगर ध्यान से सुनो,
तो एक बंदर की खामोश रोने की आवाज़ आती है… 🥺