गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उस घर में रहता था हल्कू — नाम भले ही हल्का था, पर जिम्मेदारियाँ बहुत भारी थीं।
दिन भर खेतों में मजदूरी करता, ताकि घर का चूल्हा जल सके।
सर्दियों की एक कड़कड़ाती रात थी। खेत की रखवाली करना जरूरी था, वरना जानवर फसल बर्बाद कर देते।
हल्कू के पास ना गर्म कपड़े थे, ना मोटी रजाई। बस एक पुरानी चादर और उसका वफादार कुत्ता “जुगनू”।
ठंडी हवा हड्डियाँ चुभ रही थी।
हल्कू ने आसमान की ओर देखा और बोला,
“हे भगवान, गरीब को इतनी ठंड क्यों देते हो?”
जुगनू उसके पास सटकर बैठ गया।
हल्कू मुस्कुराया, “तू ही मेरा असली साथी है।”
ठंड इतनी बढ़ी कि हाथ-पाँव सुन्न होने लगे।
हल्कू ने सूखी पत्तियाँ इकट्ठी कर आग जलाई। थोड़ी गर्मी मिली, तो आँख लग गई।
सुबह जब सूरज निकला, तो हल्कू की आँख खुली।
फसल का कुछ हिस्सा जानवरों ने खा लिया था।
लेकिन हल्कू के चेहरे पर अजीब-सी शांति थी।
पत्नी ने पूछा, “फसल खराब हो गई, तुम दुखी नहीं हो?”
हल्कू बोला,
“फसल फिर उग जाएगी…
पर अगर हिम्मत टूट गई, तो जिंदगी कैसे चलेगी?”
उस दिन से हल्कू ने ठान लिया —
गरीबी से हार नहीं मानेगा।
मेहनत करेगा, और एक दिन अपना हाल बदलेगा।