एक छोटे से गाँव के किनारे एक दुबली-पतली बिल्ली रहती थी। उसका नाम मीना था। कई दिनों से उसे ढंग से खाना नहीं मिला था। उसकी आँखों में भूख थी और पेट में खालीपन। वह इधर-उधर भटकती, कभी दुकानों के पास जाती, कभी घरों के दरवाज़ों के पास बैठकर उम्मीद से देखती।
मीना भूक के लिए तड़प रही थी, लेकिन वह किसी को परेशान नहीं करती थी। बस चुपचाप बैठकर अपनी छोटी-सी आवाज़ में “म्याऊँ” करती, जैसे कह रही हो—“अगर थोड़ा-सा भी मिल जाए…”
एक दिन स्कूल से लौटता हुआ एक बच्चा, आरव, उसे देखता है। उसे बिल्ली की हालत देखकर दया आ जाती है। वह घर जाता है और माँ से थोड़ा दूध और रोटी माँगता है। फिर दौड़कर मीना के पास आता है।
जैसे ही मीना ने खाना देखा, उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने धीरे-धीरे खाना खाया, जैसे उसे यक़ीन ही न हो रहा हो कि आज उसकी भूख मिटेगी। पेट भरने के बाद वह आरव के पैरों के पास बैठ गई और प्यार से घुरघुराने लगी।
उस दिन आरव ने समझा कि किसी भूखे की मदद करना कितना सुकून देता है। और मीना ने समझा कि इस दुनिया में अभी भी अच्छे लोग हैं।
उसके बाद से मीना रोज़ उसी रास्ते पर आरव का इंतज़ार करती, लेकिन अब भूख से नहीं—दोस्ती से।