Old village woman sharing bread with a tired monkey
提示词
गाँव के किनारे एक कच्चा सा घर था। उसी घर में रहती थी एक बूढ़ी दादी।
उनकी दुनिया बहुत छोटी थी — कुछ यादें, थोड़ी सी रोटी और ढेर सारा प्यार।
एक दिन एक छोटा सा बंदर उनके आँगन में आ बैठा।
न शरारती, न डरावना — बस थका हुआ और भूखा।
दादी ने बिना कुछ सोचे अपनी थाली आगे बढ़ा दी।
बंदर ने धीरे से रोटी ली, जैसे जानता हो कि यह हाथ किसी अपने का है।
दिन बीतते गए।
दादी उसे अपने पास बिठाकर बातें करतीं,
और बंदर उनकी गोद में सिर रखकर ऐसे आँखें बंद कर लेता
जैसे उसे माँ मिल गई हो।
कभी दादी उसे खिलातीं,
कभी दोनों धूप में साथ बैठते,
और कभी रात को एक ही कंबल में
दो थकी हुई ज़िंदगियाँ सुकून से सो जातीं।
गाँव वाले कहते,
“ये तो बस एक बंदर है।”
लेकिन दादी मुस्कराकर कहतीं,
“नहीं… ये मेरा अपना है।”
एक शाम दादी अपनी लकड़ी के सहारे चल रही थीं।
बंदर पीछे-पीछे आकर उनका हाथ थाम लेता है —
जैसे कह रहा हो,
“तुम अकेली नहीं हो।”
उस रास्ते पर कोई शब्द नहीं थे,
बस एक रिश्ता था —
जो खून से नहीं,