मेरा नाम सौरभ सहारे है और मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष पैसों से जुड़ा रहा है, ऐसा संघर्ष जो दिखता नहीं लेकिन हर दिन भीतर से तोड़ता रहता है, बचपन से ही हालात साधारण थे लेकिन जिम्मेदारियाँ असाधारण थीं, सपने देखने की हिम्मत तो थी पर उन्हें पूरा करने के साधन नहीं थे, पढ़ाई के साथ ही समझ में आ गया था कि जिंदगी सिर्फ मेहनत से नहीं चलती बल्कि पैसे के बिना मेहनत भी कई बार बेबस हो जाती है, जब कमाने की उम्र आई तो लगा अब सब बदल जाएगा लेकिन कमाई शुरू होते ही असली सच्चाई सामने आ गई, आमदनी कम थी और जरूरतें खत्म होने का नाम नहीं लेती थीं, महीने की शुरुआत उम्मीद से होती थी और अंत चिंता से, कई बार ऐसा हुआ कि पूरी मेहनत के बाद भी हाथ में कुछ नहीं बचा, खुद की इच्छाओं को तो कब का दफना दिया था लेकिन जब अपनों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाया तब सबसे ज्यादा दर्द हुआ, वो रातें जब नींद नहीं आती थी और दिमाग में सिर्फ हिसाब चलता रहता था, वो दिन जब चेहरे पर मुस्कान रखकर अंदर से टूटता रहता था, लोग सलाह देते थे मेहनत करो सब ठीक हो जाएगा लेकिन कोई यह नहीं समझता था कि मेहनत के बीच का समय कितना भारी होता है, कर्ज का डर, भविष्य की अनिश्चितता, खुद पर उठते सवाल और समाज की खामोश नजरें हर दिन हौसला तोड़ने की कोशिश करती थीं, कई बार लगा कि शायद मैं ही कमजोर हूँ या किस्मत ही खिलाफ है, लेकिन हर बार गिरकर भी उठना पड़ा क्योंकि रुकने का मतलब सब कुछ खत्म होना था, फाइनेंस की यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं थी बल्कि आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को बचाने की लड़ाई थी, समय के साथ समझ आया कि पैसे की कमी इंसान को नहीं आंकती बल्कि हालात सिखाते हैं कि मजबूत कैसे बना जाए, आज भी हालात पूरी तरह मेरे पक्ष में नहीं हैं लेकिन अब डर नहीं है, अब सीख है, समझ है और आगे बढ़ने का जज्बा है, क्योंकि जिसने अभाव में जीना सीख लिया हो वह समृद्धि को भी संभालना जानता है, मेरी कहानी दर्द भरी जरूर है लेकिन अधूरी नहीं है, क्योंकि यह संघर्ष ही मेरी पहचान बन रहा है और इस कहानी का अंत मैं खुद अपनी मेहनत और हौसले से लिखूंगा।