दो गरीब बंदर एक छोटे से टूटे-फूटे झोपड़े में रहते हैं। दोनों ने पुराने, फटे हुए शर्ट और फटी हुई पैंट पहन रखी है। वे बहुत भूखे और उदास हैं क्योंकि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। एक बंदर खाना ढूँढने के लिए गाँव की धूल भरी गलियों में निकलता है, जबकि दूसरा झोपड़ी के बाहर उम्मीद से उसका इंतज़ार करता है। काफी देर बाद उसे केवल एक छोटा-सा केला मिलता है। दोनों बंदर उसे लेकर झगड़ा नहीं करते, बल्कि मुस्कुराते हुए आधा-आधा बाँटकर खा लेते हैं। अंत में दोनों अपने टूटे-फूटे घर के सामने बैठकर मुस्कुराते हैं। भाव