यहाँ एक दिल को छू लेने वाली कहानी है:
## सुबह की पहली किरण और नदी का किनार
छोटे से गाँव के किनारे मिट्टी और फूस की एक झोपड़ी में **सूरज** अपनी माँ **देवकी** के साथ रहता था। सूरज के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। माँ दूसरों के घरों में बर्तन धोकर और सिलाई करके जैसे-जैसे सूरज को बड़ा कर रही थी। घर में गरीबी का आलम ऐसा था कि कई बार रात को दोनों सिर्फ पानी पीकर सो जाते थे।
सूरज अभी सिर्फ सोलह साल का था, लेकिन उसकी आँखों में अपनी माँ के दुखों को दूर करने का एक गहरा सपना था।
## संघर्ष की शुरुआत
गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, सूरज रोज़ सुबह चार बजे—जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा होता था—उठ जाता था। पुरानी साइकिल और बांस की दो टोकरियाँ लेकर वह गाँव से पाँच किलोमीटर दूर बड़ी नदी के घाट की तरफ निकल पड़ता।
वहाँ मछुआरे ताज़ी मछलियाँ नदी से निकालकर लाते थे। सूरज अपनी माँ की बचाई हुई छोटी-सी पूंजी से थोक में मछलियाँ खरीदता और उन्हें अपनी टोकरी में सजा लेता।
> *"सूरज बेटा, संभल के जाना,"* माँ रोज़ सुबह उसके माथे को चूमकर कहती।
> *"माँ, तू चिंता मत कर! देखना, एक दिन मैं तेरे लिए पक्का मकान बनाऊँगा,"* सूरज मुस्कुराते हुए जवाब देता।
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सूरज दिन भर कड़क धूप में नंगे पैर गाँव-गाँव घूमकर आवाज़ लगाता—*"ताज़ी नदी की मछली ले लो! ताज़ी मछली!"* उसकी ईमानदारी और मीठी बोली की वजह से गाँव के लोग उससे खुशी-खुशी मछली खरीद लेते थे।
## मेहनत का फल
सूरज सिर्फ मछलियाँ नहीं बेचता था, बल्कि जो भी थोड़े-बहुत पैसे बचते, उसमें से एक-एक रुपया अपनी माँ के हाथ में जमा कर देता। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी।
कुछ सालों की कड़ी धूप, बहते पसीने और अटूट मेहनत के बाद सूरज ने कस्बे के बाज़ार में अपनी एक छोटी-सी दुकान किराए पर ले ली। अब उसे धूप में दर-दर भटकना नहीं पड़ता था। उसकी ईमानदारी की वजह से उसकी दुकान बहुत अच्छी चलने लगी।
## एक नया सवेरा
पाँच साल बीत गए।
सूरज की मेहनत ने रंग दिखाया। उसने गाँव में अपना वही पुराना मिट्टी का घर गिराकर एक पक्का और सुंदर मकान बनवा दिया।
गृह-प्रवेश के दिन, जब सूरज ने अपनी माँ को उस नए घर के किवाड़ खोलने को कहा, तो माँ की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। सूरज ने माँ के पैर छुए और कहा, *"माँ, यह तेरी दुआओं और सुबह की उस पहली किरण का फल है, जो मुझे रोज़ जगाती थी।"*
माँ ने सूरज को गले से लगा लिया। गरीबी ने उन्हें तोड़ा ज़रूर था, लेकिन सूरज की मेहनत और हिम्मत के आगे आज गरीबी खुद हार चुकी थी।