बाजार में एक दिन अजीब नज़ारा था,
कपड़ों में सजा एक बंदर बेचारा था।
टोपी लगाई, पहना उसने कोट,
चल रहा था जैसे कोई बड़ा साहब हो ठाठ।
लोगों की भीड़ उसे देख मुस्कुराती,
कोई फोटो लेता, कोई बात बनाता।
पास खड़ा आदमी उसे गौर से देख रहा,
सोच में डूबा कुछ कहने से रह रहा।
बोला—"अरे बंदर, तू तो इंसान सा लगे,
कपड़ों में आकर तू कितना महान लगे!"
बंदर हँसकर बोला—"ये कपड़े क्या बदलेंगे,
दिल और दिमाग ही इंसान को असली बनाते हैं।"
आदमी चुप हो गया, समझ गया बात,
इंसानियत कपड़ों से नहीं, होती है दिल के साथ।